आज मैं विख्यात शायर स्वर्गीय साग़र निज़ामी जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ।
साग़र निज़ामी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय साग़र निज़ामी जी की यह ग़ज़ल –

रातों का तसव्वुर है उनका और चुपके-चुपके रोना है ।
ऐ सुब्ह के तारे तू ही बता अन्जाम मिरा क्या होना है ।
इन नौ-रस आँखों वालों का क्या हँसना है, क्या रोना है,
बरसे हुए सच्चे मोती हैं बहता हुआ ख़ालिस सोना है ।
दिल को खोया ख़ुद भी खोए, दुनिया खोई, दीन भी खोया,
ये गुम-शुदगी है तो इक दिन ऐ दोस्त तुझे भी खोना है ।
तमईज़-ए-कमाल-ओ-नक्स उठा ये तो रौशन है दुनिया पर,
मैं चन्दन हूँ तू कुन्दन है मैं मिट्टी हूँ तू सोना है ।
तू ये न समझ लिल्लाह कि है तस्कीन तिरे दीवानों को,
वहशत में हमारा हँस पड़ना दर-अस्ल हमारा रोना है ।
मातम है मेरी आवाज़ शिकस्त-ए-साज-ए-दिल-ए-सद-पारा का
’सागर’ मेरा नग़्मा भी दीपक के सुरों में रोना है ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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