जब कोई फूल मिरी!

मैं ने उस जान-ए-बहाराँ को बहुत याद किया,
जब कोई फूल मिरी शाख़-ए-हुनर पर निकला|

अहमद फ़राज़

2 responses to “जब कोई फूल मिरी!”

  1. बेहतरीन

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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