आज मैं हिंदी नवगीत की श्रेष्ठ कवियित्री स्वर्गीय शांति सुमन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ।
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयरकी हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय शांति सुमन जी का यह गीत –

मुझमें अपनापन बोता है
सांझ-सकारे यह मेरा घर
उगते ही सूरज के-
रोशनदान बांटते ढेर उजाले
धूपों के परदे में
खिल-खिल उठते हैं खिड़की के जाले
चिडि़यों का जैसे खोता है
झिन-झिन बजता है कोई स्वर
एक हंसी आंगन से उठती
और फैल जाती तारों पर
मन की सारी बात लिखी हो
जैसे उजली दीवारों पर
एक प्यार सबकुछ होता है
जिससे डरते हैं सारे डर
दरवाज़े पर सांकल मां की
आशीषों से भरी उंगलियां
पिता कि जैसे बाम-फूटती
एक स्वप्न में सौ-सौ किलयां
जहां परायापन रोता है
लुक-छिप खुशी बांटती मन भर
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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