एक छलावा!

आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय विजयदान देथा ‘बिज्जी’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।

इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री स्वर्गीय विजयदान देथा ‘बिज्जी’ जी की यह कविता –


ऊषे !
मैं चिर मौन रहूँ भी तो क्योंकर ?

जब बादल का श्याम हृदय भी
पिघल-पिघल, गल-गल
बरस पड़ता है झरझर!
सुनकर
तृषित चातक की करुण पुकार!

सुन कोकिल की अन्तर-कराह
रस देते हैं उसको रसाल!
सुकुमार सुमनों को देखो
गुनन-गुनन गायन सुनकर ही तो
देते हैं मृदु-मृदु चुम्बन
मृदु आंलिगन
मधुपान करा मधुकर को !


औरों की क्या बात अरे
सहृदय माता भी कब देती है!
अमृतमय जीवन मृदु-दुग्ध स्तन
बिना सुने शिशु का रोदन!
इस जग में कुछ भी असह्यनीय
अरे अति पीड़ामय
तो वह मौन-श्रृंखला ही का बन्धन!

कण-कण में प्रतिबिम्बित!
जो रोम-रोम में अन्तर्हित!
उसको भी रहकर चिर मौन
जब पाना दुर्लभ रे अति दुष्कर!


ऊषे!
मैं चिर मौन रहूँ भी क्योंकर!
सुन कोकिल की अन्तर कराह
रस देते हैं उसको रसाल!


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

********

2 responses to “एक छलावा!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

    Liked by 2 people

    1. नमस्कार जी

      Liked by 1 person

Leave a reply to samaysakshi Cancel reply