आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री विनोद निगम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ।
इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहींकी हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री विनोद निगम जी का यह नवगीत –

घाटियों में रितु सुखाने लगी है
मेघ धोए वस्त्र अनगिन रंग के
आ गए दिन, धूप के सत्संग के
पर्वतों पर छन्द फिर बिखरा दिए हैं
लौटकर जाती घटाओं ने ।
पेड़, फिर पढ़ने लगे हैं, धूप के अख़़बार
फुरसत से दिशाओं में
निकल फूलों के नशीले बार से
लड़खड़ाती है हवा
पाँव दो पड़ते नहीं हैं ढंग से ।
आ गए दिन, धूप के सत्संग के
बँध न पाई निर्झरों की बाँह, उफनाई नदी
तटों से मुँह जोड़ बतियाने लगी है ।
निकल कर जंगल की भुजाओं से, एक आदिम गंध
आँगन की तरफ आने लगी है ।
आँख में आकाश के चुभने लगे हैं
दृश्य शीतल नेह देह प्रसंग के ।
आ गए दिन, धूप के सत्संग के
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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