लालटेन!

आज मैं हिंदी के एक श्रेष्ठ कवि श्री राजा खुगशाल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।

खुगशाल जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री राजा खुगशाल जी की यह कविता –


अंधेरी रातों में
इसके उजाले में
पहाड़े रटते थे हम
बैलों के रस्से बटते थे–

डूंगर काका
इसके उजाले में
सीखे थे हमने
वर्णमाला के अक्षर
इर्द-गिर्द होता रहा था
गृहस्थी का हिसाब
जीवन का जोड़-घटाव

इसके उजाले में
ऊंघे थे सपने
सो कर जगे थे हम
दिन भर टंगी रहती थी
खूँटी पर
हमारे जीवन के
जंग की लालटेन
पीतल की काली लालटेन

दुनिया की दूसरी बड़ी लड़ाई के टैम पर
इसे पिता सात समन्दर पार से लाए थे ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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2 responses to “लालटेन!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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