क्‍या वो दिन भी दिन हैं!

आज मैं प्रसिद्ध साहित्यकार और शायर स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ।

राही मासूम रज़ा साहब की रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राही मासूम रज़ा साहब की यह ग़ज़ल –


क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए
क्‍या वो रातें भी रातें हैं जिनमें नींद ना आए।

हम भी कैसे दीवाने हैं किन लोगों में बैठे हैं
जान पे खेलके जब सच बोलें तब झूठे कहलाए।

इतने शोर में दिल से बातें करना है नामुमकिन
जाने क्‍या बातें करते हैं आपस में हमसाए।।

हम भी हैं बनवास में लेकिन राम नहीं हैं राही
आए अब समझाकर हमको कोई घर ले जाए ।।

क्‍या वो दिन भी दिन हैं जिनमें दिन भर जी घबराए ।।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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3 responses to “क्‍या वो दिन भी दिन हैं!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. Namaskar ji, Happy New year

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      1. आपको भी हार्दिक शुभकामनाएँ नव वर्ष की ❤️

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