आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय राजकुमार कुंभज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।
कुंभज जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। आप अज्ञेय जी द्वारा संपादित चौथा सप्तक में सम्मिलित थे।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राजकुमार कुंभज जी की यह कविता –

एक खिला
बुझ गया दूसरा उसी वक़्त
सही वक़्त वही, जिसमें खिलें सब
बुझे नहीं कोई भी
गर्भस्थ शिशु परमात्मा है
और एक ग़रीब आदमी उससे भी ज़्यादा
मैंने देखा नहीं है कभी परमात्मा
लेकिन देखा है ग़रीब
ग़रीबी भी देखी है बहुत क़रीब से
ग़रीबी में ही पला-बढ़ा, बड़ा हुआ हूँ
शायद इसलिए
इस-उस आरोह-अवरोह का
धुंध भरा गुनाह हुआ हूँ
मैं कैसे लिख सकता हूँ प्रस्तावना प्रेम-गीत की
मेरे पास तो, न रोटी है, न नमक
मेरे पास रोटी-नमक की चिंता है बड़ी
जो सबके लिए
एक खिला
दूसरा बुझ गया उसी वक़्त
इसे मत कहॊ सही वक़्त
ये नहीं है सही वक़्त
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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