आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ।
सरोज जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मुकुट बिहारी सरोज जी की यह कविता –

शायद तुमने, दुनिया को, देखा ही नहीं क़रीब से
इसीलिए बातें करते हो हारी-हारी-सी !
देखी केवल भीड़ और हिम्मत खो बैठे
रचे-रचाए मन की सब मेहंदी धो बैठे !
मुस्कानों की फ़सल उगेगी भी तो कैसे
जब सपनों के खेतों में आँसू बो बैठे !!
मौन मुखर करने के लिए किसी मूरत का
इतना ढालो नेह डूब जाए मन्दिर की बारहदारी !
लहरों की इन बातों में कुछ सार नहीं है
इस अपार पानी का कोई पार नहीं है !
क्योंकि नाव कोई-कोई देखी ऐसी भी
जिसे डुबाने कोई भी तैयार नहीं है !!
बहने वाला हो तो ये मँझधारें क्या हैं
आगे-आगे हाथ पकड़ खुद चलती है आँधी बेचारी !!
लगी बुरी होती है कैसे काम न होगा
और बहुत से बहुत तुम्हारा नाम न होगा !
चलती जब तक साँस समय का साथ निबाहो
जीवन तो फिर कम से कम बदनाम न होगा !!
कैसे सम्भव जहाँ तुम्हारा गिरे पसीना
वहाँ उतर कर चाँद न आए करने को आरती तुम्हारी !!
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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