ज़माना आ गया!

आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ|

रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी की यह ग़ज़ल-


ज़माना आ गया रुसवाइयों तक तुम नहीं आए ।
जवानी आ गई तनहाइयों तक तुम नहीं आए ।।

धरा पर थम गई आँधी, गगन में काँपती बिजली,
घटाएँ आ गईं अमराइयों तक तुम नहीं आए ।

नदी के हाथ निर्झर की मिली पाती समंदर को,
सतह भी आ गई गहराइयों तक तुम नहीं आए ।

किसी को देखते ही आपका आभास होता है,
निगाहें आ गईं परछाइयों तक तुम नहीं आए ।

समापन हो गया नभ में सितारों की सभाओं का,
उदासी आ गई अंगड़ाइयों तक तुम नहीं आए ।

न शम्म’अ है न परवाने हैं ये क्या ‘रंग’ है महफ़िल,
कि मातम आ गया शहनाइयों तक तुम नहीं आए ।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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2 responses to “ज़माना आ गया!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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