एक किरन भोर की!

आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी गीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र  जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|  

मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – 


एक किरन भोर की
उतराई आँगने ।
रखना इसको सँभाल कर,
लाया हूँ माँग इसे
सूरज के गाँव से
अँधियारे का ख़याल कर ।

अँगीठी ताप-ताप
रात की मनौती की,
दिन पूजे धूप सेंक-सेंक ।
लिपटा कर बचपन को
खाँसते बुढ़ापे में,
रख ली है पुरखों की टेक ।
जलपाखी आस का
बहुराया ताल में
खुश हैं लहरें उछालकर ।

सोना बरसेगा
जब धूप बन खिलेगा मन,
गेंदे की हरी डाल पर ।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

                                     ********

2 responses to “एक किरन भोर की!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

    Liked by 2 people

    1. नमस्कार जी

      Liked by 1 person

Leave a reply to samaysakshi Cancel reply