आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी गीतकार श्री बालस्वरूप राही जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ|
राही जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बालस्वरूप राही जी का यह गीत –

तुम्हीं न समझी जब मेरे गीतों की भाषा
दुनिया सौ-सौ अर्थ लगाये क्या होता है
यह मेरे मन की कमज़ोरी या मजबूरी
कुछ भी कह लो, सिर्फ तुम्हें ही अपनाया है
तुम्हें समर्पित किया सहज ही इस जीवन में
जो कुछ भी खोया-पाया, रोया-गाया है
तुम्हें न दुहरा पाई मेरा गीत प्राण! जब,
सारे का सारा जग गाए, क्या होता है
मात्र बहाना था गीतों का सृजन मुझे तो
अपना दर्द तुम्हारे दिल तक पहुंचाना था
जो न अन्यथा कह पता मैं सुन पातीं तुम
कुछ ऐसा था राज़ तुम्हें जो समझाना था।
मेरा दर्द न छू पाया जब हृदय तुम्हारा
पत्थर का भी दिल पिघलाये क्या होता है।
और सभी मिल जाते केवल वही न मिलता
चाह करो जिसकी दुनिया का यही नियम है
सारे स्वर सध जाते केवल वही न सधता
जो प्रिय हो मन को, जीवन ऐसी सरगम है।
तुम्हीं न अर्पण मेरा जब स्वीकार कर सकीं
यह सारी दुनिया अपनाये, क्या होता है
तुम्हीं न समझीं जब मेरे गीतों की भाषा
दुनिया सौ-सौ अर्थ लगाये क्या होता है।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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