नानी!

आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि श्री प्रयाग शुक्ल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|  

शुक्ल जी की रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री प्रयाग शुक्ल जी की यह कविता – 

मेरी बेटी ने नहीं देखा मेरी नानी को ।
(नानी की कोई तस्वीर भी नहीं है मेरे पास )
मुझे भी अपनी नानी की धुंधली-सी याद है ।
नानी गाँव के एक घर में रहती थी
(उजले आंगन और अंधियारे कमरों के घर में}
नानी के गाँव में एक नहर थी ।

नानी अपने एक बेटे के पास रहती थी । शहर में ।
(छूटा जब गाँव का घर )
बूढ़ी नानी । एक छुट्टियों में हमें जब
गाड़ी पकड़नी थी रात की– नानी
अपने संदूक को खोल कर
कुछ ढूंढ रही थी टटोलती–
नानी ने मुझे कोई चीज़ दी थी–
शायद हरे-काले से हो
गये कुछ पैसे
कुछ ठीक से याद नहीं
नानी ने कोई चीज़ दी तो थी ज़रूर !


नानी का चेहरा– वह तो और
भी याद नहीं ।

 (आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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4 responses to “नानी!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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