आज मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय नरेश मेहता जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
मेहता जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेश मेहता जी का यह नवगीत –

पीले फूल कनेर के
पट अंगोरते सिन्दूरी बड़री अँखियन के
फूले फूल दुपेर के।
दौड़ी हिरना
बन-बन अंगना
वोंत वनों की चोर भुर लिया
समय संकेत सुनाए,
नाम बजाए,
साँझ सकारे,
कोयल तोतों के संग हारे
ये रतनारे-
खोजे कूप, बावली झाऊँ
बाट, बटोही, जमुन कछारे
कहाँ रास के मधु पलास हैं?
बट-शाखों पर सगुन डालते मेरे मिथुन बटेर के
पीले फूल कनेर के।
पाट पट गए,
कगराए तट,
सरसों घेरे खड़ी हिलती-
पीत चँवरिया सूनी पगवट
सखि! फागुन की आया मन पे हलद चढ़ गई
मेंहदी महुए की पछुआ में
नींद सरीखी लान उड़ गई
कागा बोले मोर अटरिया
इस पाहुन बेला में तूने
चौमासा क्यों किया पिया?
यह टेसू-सी नील गगन में-
हलद चाँदनी उग आई री
उग आई री
अभी न लौटे उस दिन गए सबेर के!
पीले फूल कनेर के।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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