आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय दूधनाथ सिंह जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
दूधनाथ सिंह जी की अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय दूधनाथ सिंह जी की यह कविता –

काले समन्दर में अचानक एक लाल स्तम्भ उगता है ।
लहर-लहर मारती है गैंती–टूटकर फैलता है लाल रंग
एक ग़ुस्सैल इशारे की तरह
तमतमाता हुआ सूरज
उठता है : गिरता है
काला समन्दर फिर
अपना वही अट्टहास– शुरू करता है
लौटते हैं हम चुपचाप ।
शुरू होती है कविता फिर
एक चीख़ की मानिन्द ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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