आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि तथा नवगीत के एक प्रमुख हस्ताक्षर स्वर्गीय देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे इन्द्र जी का भरपूर स्नेह और मार्गदर्शन मिला परंतु उनकी अधिक रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय देवेन्द्र शर्मा इन्द्र जी का यह नवगीत –

राह में आँखें बिछाये
किसलिए बैठा
अब यहाँ कोई न आयेगा.
धूप का रथ
दूर आगे बढ़ गया
सिर्फ पहियों की
लकीरें रह गयी
थी इमारत एक
सागर तीर पर
नींव, छत, दीवार जिसकी
ढह गयी.
पश्चिमी आकाश में
उड़ते पखेरु-सा
सूर्य थककर डूब जायेगा.
नील जल पर
एक टूटी नाव-सी
लाश लावारिस दिवस की
तिर रही
थम गया है
काफिला आवाज का
चुप्पियों पर
दीपवेला घिर रही.
अश्रुकण सा रात भर अब
व्योम-पलकों में
शुक्रतारा झिलमिलायेगा
पारिजातों की
विलम्बित छाँव में
रोकती पलभर
सुरभि की किन्नरी
पर नियति में
सार्थवाहों के लिखी
रेत के पदचिह्न-सी
यायावरी
सब जहाँ अपनी सुनाते हों
विजय-गाथा
तू व्यथा किसको सुनायेगा
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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