शब्द संभव हैं!

आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय चंद्रकांत देवताले जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|

देवताले जी की अधिक रचनाएं शायद मैंने पहले कभी शेयर नहीं की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय चंद्रकांत देवताले जी की यह कविता –


तुम मुझसे पूछ रही हो
और मैं तुमसे
पर सचमुच क्या हमारे बीच
शब्द जीवित हैं

आवाजों का दरख्त
अंधी बावड़ी में
लकवाग्रस्त गूँगे की तरह…
और फिर भी तुम पूछ रही हो
“कौन बोल रहा है ? “

तुम कुल्हाड़ी मत बनाओ
कोयले से फ़र्श पर
आतंकित मत करो कमरे को-

ये छपे शब्द
जीवित आदमी की
फुसफुसाहट भी तो नहीं
ये मृत राख में
अंधी कौड़ियों की तरह
इन्हें मत दिखाओ,

समय काटने के लिए
तुम स्वेटर क्यों नहीं बुनती
मैं नाखून क्यों नहीं काटता
समुद्र की बेहोशी की ख़बर
आकाश तक को पता
पर यह नहीं वक़्त
दरवाज़े को खोलकर
तुम कमरे को सड़क मत बनाओ

भरोसा रखो हवा पर
वह तोड़ कर रख देगी
जंगलों की चुप्पी
गूँगे नहीं रहेंगे दरख्त
मथ देगी समुद्र
झाग में तैरेंगे जीवित शब्द

तब तक
अच्छा नहीं लगता सुनना कुछ भी
तुम चुप रहो
बन्द कर दो रेडियो को…

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

********

4 responses to “शब्द संभव हैं!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

    Liked by 2 people

    1. नमस्कार जी

      Liked by 1 person

  2. पहली बार देवताले जी का लिखा पढ़ने को मिला । एक अलग ही अंदाज़ है ।

    Liked by 2 people

    1. धन्यवाद जी

      Liked by 2 people

Leave a reply to Nageshwar singh Cancel reply