आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय कैलाश गौतम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
कैलाश जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय कैलाश गौतम जी की यह कविता –

बीते दिन
मैं भूल नहीं पाता,
था कोई जो
मुझे देखकर
मई जून की तेज़ धूप में
मेरे आगे हो जाता था
बादल, पेड़, खुला छाता ।
मन से जुड़ता
चुटकी लेता
ताने कसता था,
खिल उठता था ताल
चाँद पानी में हँसता था
मैं उसकी आँखों में सोता
वह मेरी साँसों में गाता ।
कैसे-कैसे शहर और
कैसी यात्राएँ हैं,
तेज़ धार में हाथ थामकर
साथ नहाए हैं
कितना सहज समर्पण था वह
कैसा था स्वाभाविक नाता
कैसी-कैसी सीमाएँ थीं
कैसे घेरे थे,
शामें थीं रसवंत और
जीवंत सबेरे थे
तन जैसे लहराता रहता
रस जैसे मौसम बरसाता ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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