वस्ल की शब थी तो!

वस्ल की शब थी तो किस दर्जा सुबुक गुज़री थी,
हिज्र की शब है तो क्या सख़्त गिराँ ठहरी है|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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