आज पहली बार फिर मैं, हिन्दी नवगीत के श्रेष्ठ हस्ताक्षर स्वर्गीय अश्वघोष जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मैं शायद उनसे कभी मिला नहीं किन्तु वे मेरे मित्रों के मित्र थे और कल ही उनके देहांत का दुखद समाचार मिला|
अश्वघोष जी की रचनाएं शायद मैंने पहले कभी शेयर नहीं की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय अश्वघोष जी का यह नवगीत –

पता नहीं किस ज़ालिम डर से
उठा नहीं सूरज बिस्तर से ।
मुख पर हाथ धरे कोलाहल,
ढूँढ़ रहा इस जड़ता का हल ।
पक्षी व्याकुल बुरी ख़बर से,
उठा नहीं सूरज बिस्तर से ।
चूल्हा लेता हैं अँगड़ाई,
अभी गोद में आँच न आई ।
चूक हुई क्या पूरे घर से,
उठा नहीं सूरज बिस्तर से ।
तरस रहे पोथी में आखर,
गूँजे नहीं चेतना के स्वर ।
बन्द पड़े हैं खुले मदरसे,
उठा नहीं सूरज बिस्तर से ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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