थके-माँदे मुसाफ़िर!

थके-माँदे मुसाफ़िर ज़ुल्मत-ए-शाम-ए-ग़रीबाँ में,
बहार-ए-जल्वा-ए-सुब्ह-ए-वतन को याद करते हैं|

चकबस्त ब्रिज नारायण

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