छूटा-गाँव, छूटी गली!

आज एक बार फिर मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ कवि और कुशल मंच संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इस कविता में एक गरीब और अशिक्षित कन्या के मन में पैदा होने वाली आशंकाएं अभिव्यक्त की गई हैं, जिसे विवाह होने पर अनजान क्षेत्र में जाना पड़ता है|

चक्रधर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता –



रोको, रोको !
ये डोली मेरी कहां चली,
छूटा-गाँव, छूटी गली।

रोक ले बाबुल, दौड़ के आजा, बहरे हुए कहार,
अंधे भी हैं ये, इन्हें न दीखें, तेरे मेरे अंसुओं की धार।
ये डोली मेरी कहां चली,

छूटा-गाँव, छूटी गली।

कपड़े सिलाए, गहने गढ़ाए, दिए तूने मखमल थान,
बेच के धरती, खोल के गैया, बांधा तूने सब सामान,
दान दहेज सहेज के सारा, राह भी दी अनजान,
मील के पत्थर कैसे बांचूं, दिया न अक्षर-ज्ञान।
गिरी है मुझ पर बिजली,
छूटा-गाँव, छूटी गली।
ये डोली मेरी कहां चली,
छूटा-गाँव, छूटी गली।

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|

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2 responses to “छूटा-गाँव, छूटी गली!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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