हमारे ज़ख़्म-ए-दिल!

हमारे ज़ख़्म-ए-दिल दाग़-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं,
गुलों से गुल-रुख़ों से महवशों से माह-पारों से|

कैफ़ भोपाली

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