मेरी क्या औक़ात!

क़ातिल भी मक़्तूल भी दोनों नाम ख़ुदा का लेते थे,
कोई ख़ुदा है तो वो कहाँ था मेरी क्या औक़ात लिखूँ|

जावेद अख़्तर

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