उनको बारात लिखूँ!

ग़म नहीं लिक्खूँ क्या मैं ग़म को जश्न लिखूँ क्या मातम को,
जो देखे हैं मैं ने जनाज़े क्या उन को बारात लिखूँ|

जावेद अख़्तर

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