कुछ फ़ज़ा कुछ!

कुछ क़फ़स की तीलियों से छन रहा है नूर सा,
कुछ फ़ज़ा कुछ हसरत-ए-परवाज़ की बातें करो|

फ़िराक़ गोरखपुरी

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