आज एक बार फिर मैं हिन्दी साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपना उल्लेखनीय योगदान करने वाले श्रेष्ठ कवि श्री रामदरश मिश्र जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ|
मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है श्री रामदरश मिश्र जी की यह कविता –

मैं लिखता हूँ तो
कोई साहित्य-सिद्धांत मेरे सामने नहीं होता,
होता है अपना और आसपास का जिया हुआ जीवन
और उस जीवन से निकली हुई भाषा
आपका साहित्य शास्त्र
अपने को इसके अनुकूल पाता है तो पा ले,
नहीं तो मसीहा बने रहने के लिए
बंध्या-बहस करते रहिए दूसरों की भाषा में
मेरी रचनाएँ
जैसी भी हैं, मेरी हैं
वे चुपचाप पहुँचती रहेंगी उन तक
इनमें जिनका दर्द बोलता है,
जिनका राग गूँजता है,
जिनका संघर्ष कसमसाता है,
जिनके सपनों के पंख फड़फड़ाते हैं,
जिनके आसपास के खुले विस्तार में व्याप्त
ऋतुओं की विविध रंग-कथाएँ हैं
आप पता नहीं कल यहाँ होंगे,
लेकिन मेरी रचनाएँ तो कल भी पहुँचती रहेंगी
जहाँ पहुँचना होगा,
क्योंकि वे शुष्क सिद्धांत नहीं हैं,
अंतर के छोटे-बड़े गान हैं
यानी कि आदमी के आदमी होने की पहचान हैं।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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