आज कुछ उस नाज़!

जो हयात-ए-जाविदाँ है जो है मर्ग-ए-ना-गहाँ,
आज कुछ उस नाज़ उस अंदाज़ की बातें करो|

फ़िराक़ गोरखपुरी

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