ये सुकूत-ए-नाज़ ये!

ये सुकूत-ए-नाज़ ये दिल की रगों का टूटना,
ख़ामुशी में कुछ शिकस्त-ए-साज़ की बातें करो|

फ़िराक़ गोरखपुरी

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