लफ़्ज़ चुनता हूँ तो!

लफ़्ज़ चुनता हूँ तो मफ़्हूम बदल जाता है,
इक न इक ख़ौफ़ भी है जुरअत-ए-इज़हार के साथ|

क़तील शिफ़ाई

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