वरक़ तिरी याद के!

ये सुख़न जो हम ने रक़म किए ये हैं सब वरक़ तिरी याद के,
कोई लम्हा सुब्ह-ए-विसाल का कोई शाम-ए-हिज्र की मुद्दतें|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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