मेरी कुछ और रचनाएं-1

एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनका भी ढोल पीट लेता हूँ क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और ईको सिस्टम दूर-दूर तक नहीं है, कम से कम मेरा यहाँ कोई साहित्यिक संपर्क नहीं है|

जैसा मैंने पहले भी बताया है, हमेशा ‘श्रीकृष्ण शर्मा’ नाम से रचनाएं लिखता रहा, उनका प्रकाशन/ प्रसारण भी हमेशा इसी नाम से हुआ, लेकिन बाद में  जबकि मालूम हुआ कि इस नाम से कविताएं आदि लिखने वाले कम से कम दो और रचनाकार रहे हैं, इसलिए अब मैं अपनी कविताओं को पहली बार श्रीकृष्ण शर्मा ‘अशेष’ नाम से प्रकाशित कर रहा हूँ, जिससे एक अलग पहचान बनी रहे।


इस बीच कुछ और अधूरी सी रचनाएं पुराने कागजों में दिखाई पड़ गईं तो उनको भी धूप दिखा देता हूँ| लीजिए प्रस्तुत है आज की रचना-

चाँदनी के, रोशनी के, हर हंसी के गीत गायें,

किन्तु इसके साथ हम, कुछ-कुछ अंधेरा भी हटायें|

हर हंसी वह प्यार जिसमें, आरती है, अर्चना है,

चाँदनी की दीप्ति निर्मल, प्रेम की मृदु भावना है|

रोशनी पर वह न हो, जिसमें किसी का घर जला हो,

औ हंसी भी वह नहीं, उपहास जिसमें दिन का हो|

स्नेह की बौछार का, विस्तार हो सारे जगत में,

क्रूरता की, वहशियत की, सब क्रियाओं को मिटाएं|

हम लगन से, प्राणपन से,देश का उद्धार कर दें,

अन्न –जल- फल औ खनिज का, हर तरह भंडार भर दें|

अथक श्रम से, नियत क्रम से, दूर करना है अंधेरा,

हर अधर पर हो हंसी, हर झौंपड़ी में हो सवेरा|

प्रीत के उन्मुक्त स्वर तब सब दिशाएं गुनगुनाएं,

त्रास और अभाव सारे, घुटन-पीड़ा भूल जाएं|

सरल यह इतना नहीं है, युद्ध करना है स्वयं से,

आदतों औ कायदों, अपने सुभीते से, अहं से,

और अपने प्रियजनों का कोप भी संभव बहुत है,

किन्तु इसके बिना जीवन, बेरहम है, मार्गच्युत है|

वह हंसी निष्काम, निश्छल, किसी बच्चे की हंसी सी,

हर अधर पर हो तभी हम गीत का परिवेश पाएं|

श्रीकृष्ण शर्मा अशेष

आज के लिए इतना ही, कल अपनी कोई और रचना शेयर करने का प्रयास करूंगा|

नमस्कार

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2 responses to “मेरी कुछ और रचनाएं-1”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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