आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी नवगीतकार स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
ओम प्रभाकर जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय ओम प्रभाकर जी का यह नवगीत –

उफ़, यह समय
झरता हुआ।
कल के बेडौल हाथों
हुए ख़ुद से त्रस्त।
कहीं कोई है
कि हममें कँपकँपी भरता हुआ।
बनते हुए ही टूटते हैं हम
पठारी नदी के तट से।
हम विवश हैं फोड़ने को
माथ अपना निजी चौखट से।
एक कोई है
हमें हर क्षण ग़लत करता हुआ।
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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