याद हो कि न याद हो!

कहीं तुम को जाना हुआ अगर न गए बग़ैर ‘नज़ीर’ के,
वो ज़माना अपने ‘नज़ीर’ का तुम्हें याद हो कि न याद हो|

नज़ीर बनारसी

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