मिरी हर नज़र थी इक

हुए मुझ से जिस घड़ी तुम जुदा तुम्हें याद हो कि न याद हो,
मिरी हर नज़र थी इक इल्तिजा तुम्हें याद हो कि न याद हो|

नज़ीर बनारसी

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