चंद क़तरा-ए-अश्क!

तुम्हें चंद क़तरा-ए-अश्क भी किए पेश जिस के जवाब में,
वो सलाम नीची निगाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो|

नज़ीर बनारसी

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