अभी फ़स्ल गुलों की!

हमें तुम पे गुमान-ए-वहशत था हम लोगों को रुस्वा किया तुम ने,
अभी फ़स्ल गुलों की नहीं गुज़री क्यूँ दामन-ए-चाक सिया तुम ने|

इब्न-ए-इंशा

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