निगह-ए-शौक़ घड़ी भर!

है वही आरिज़-ए-लैला वही शीरीं का दहन,
निगह-ए-शौक़ घड़ी भर को जहाँ ठहरी है|

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

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