ये ज़मीन कितनी सिमट गई

मिरी ज़िंदगी भी मिरी नहीं ये हज़ार ख़ानों में बट गई,
मुझे एक मुट्ठी ज़मीन दे ये ज़मीन कितनी सिमट गई|

बशीर बद्र

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