बदन से लिपट गई

तिरी याद आए तो चुप रहूँ ज़रा चुप रहूँ तो ग़ज़ल कहूँ,
ये ‘अजीब आग की बेल थी मिरे तन-बदन से लिपट गई|

बशीर बद्र

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