फ़राग़त उसे भी थी!

उस रात देर तक वो रहा महव-ए-गुफ़्तुगू,

मसरूफ़ मैं भी कम था फ़राग़त* उसे भी थी|

*निश्चिंतता

मोहसिन नक़वी

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