छू लिए साक़ी के होंट!

सुर्ख़ी-ए-मय कम थी मैं ने छू लिए साक़ी के होंट,
सर झुका है जो भी अब अरबाब-ए-मय-ख़ाना कहें|

मजरूह सुल्तानपुरी

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