राह में लाखों वीराने!

सुनते हैं कि काँटे से गुल तक हैं राह में लाखों वीराने,

कहता है मगर ये अज़्म-ए-जुनूँ सहरा से गुलिस्ताँ दूर नहीं|

मजरूह सुल्तानपुरी

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