बज़्म का ये दस्तूर नहीं

महफ़िल-ए-अहल-ए-दिल है यहाँ हम सब मय-कश हम सब साक़ी,

तफ़रीक़ करें इंसानों में इस बज़्म का ये दस्तूर नहीं|

मजरूह सुल्तानपुरी

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