ख़याली हूर नहीं!

जन्नत ब-निगह तसनीम ब-लब अंदाज़ उस के ऐ शैख़ न पूछ,

मैं जिस से मोहब्बत करता हूँ इंसाँ है ख़याली हूर नहीं|

मजरूह सुल्तानपुरी

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