इतना तो कोई मजबूर!

तक़दीर का शिकवा बे-मअ’नी जीना ही तुझे मंज़ूर नहीं,

आप अपना मुक़द्दर बन न सके इतना तो कोई मजबूर नहीं|

मजरूह सुल्तानपुरी