दिलों को ग़ुलाम करो!

कब से खड़े हैं बर में ख़िराज-ए-इश्क़ के लिए सर-ए-राहगुज़ार,

 एक नज़र से सादा-रुख़ो हम सादा-दिलों को ग़ुलाम करो|

इब्न-ए-इंशा 

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