सदा क्यूँ नहीं देते!

क्या बीत गई अब के ‘फ़राज़’ अहल-ए-चमन पर,

यारान-ए-क़फ़स मुझ को सदा क्यूँ नहीं देते|

अहमद फ़राज़ 

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