बुझा क्यूँ नहीं देते!

वहशत का सबब रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो नहीं है,

मेहर ओ मह ओ अंजुम को बुझा क्यूँ नहीं देते|

अहमद फ़राज़ 

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