कभी जादा-ए-तलब से जो फिरा हूँ दिल-शिकस्ता,
तिरी आरज़ू ने हँस कर वहीं डाल दी हैं बाँहें|
मजरूह सुल्तानपुरी
A sky full of cotton beads like clouds
कभी जादा-ए-तलब से जो फिरा हूँ दिल-शिकस्ता,
तिरी आरज़ू ने हँस कर वहीं डाल दी हैं बाँहें|
मजरूह सुल्तानपुरी
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